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टूटने का दर्द
भाग 1: सपनों की शहर
दिल्ली की सड़कें रात के अंधेरे में किसी भूखे जानवर की तरह फैली हुई थीं। स्ट्रीट लाइटें टिमटिमा रही थीं, जैसे खुद अपनी ही रोशनी से शर्मिंदा हों। अर्जुन शर्मा, उम्र 32 साल, एक साधारण सरकारी दफ्तर का क्लर्क, अपनी पुरानी स्कूटी पर घर लौट रहा था। उसके चेहरे पर थकान के गहरे निशान थे, लेकिन आँखों में अभी भी एक उम्मीद की किरण टिमटिमा रही थी।
"बस दो साल और, फिर मैं अपनी छोटी सी दुकान खोल लूँगा," अर्जुन ने खुद से कहा।
उसकी ज़िंदगी सादी थी - सुबह 9 बजे दफ्तर, शाम 6 बजे घर, रात को अपनी पत्नी प्रिया और 5 साल की बेटी अनन्या के साथ खाना। कोई बड़ा सपना नहीं, बस एक छोटी सी खुशहाल ज़िंदगी।
उस रात जब वह घर पहुँचा, प्रिया ने दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर चिंता के भाव थे।
"अर्जुन, तुम्हारे दफ्तर से फोन आया था। कल तुम्हें किसी जाँच के लिए बुलाया गया है।"
"जाँच? किस बात की?" अर्जुन हैरान हुआ।
"पता नहीं, बस इतना कहा कि तुम्हारे विभाग में कुछ गड़बड़ी हुई है।"