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समय के पंख
एक प्रेरणादायक हिंदी कथा जो सिखाती है कि समय सबसे बड़ा धन है
गाँव के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रहता था एक लड़का — **आरव**। उसकी उम्र सत्रह साल थी और सपने बड़े-बड़े। वह दुनिया का सबसे बड़ा संगीतकार बनना चाहता था। उसके पास एक पुरानी सारंगी थी, जो उसके दादाजी की थी। हर शाम जब सूरज डूबता, तो आरव सोचता, *"कल से अभ्यास शुरू करूँगा।"* लेकिन कल आता और फिर वही बात — *"अभी तो बहुत समय है, पहले दोस्तों के साथ घूम लूँ।"* आरव का सबसे अच्छा दोस्त **वीर** भी संगीत सीखना चाहता था। लेकिन वीर हर रोज़ सुबह चार बजे उठकर तालाब के किनारे बैठकर रियाज़ करता। आरव उस पर हँसता, *"अरे पागल, ज़िंदगी जीनी है या सिर्फ़ सारंगी बजानी है?"* वीर मुस्कुराता और कहता, *"ज़िंदगी तभी जी जाती है, जब समय का साथ दिया जाए।"* आरव ये बात नहीं समझता था। वो सोचता था कि जवानी तो अभी शुरू हुई है, क्या जल्दबाज़ी है?
साल बीतते गए। आरव अब बाईस साल का हो गया था। वीर का नाम रेडियो पर आने लगा था। उसकी आवाज़ लोगों के दिलों में उतर रही थी। और आरव? आरव अब भी उसी झोपड़ी में रहता था, अब भी *"कल से शुरू करूँगा"* कहता था। उसकी सारंगी पर धूल जम चुकी थी, जैसे उसके सपनों पर भी। एक दिन आरव ने सारंगी उठाई, लेकिन उसकी तार टूट चुकी थीं। उसने सोचा, *"पहले तार बदलूँगा, फिर रियाज़ करूँगा।"* लेकिन तार बदलने की जगह वो शाम को दोस्तों के साथ चौपाल पर बैठ गया। रात हो गई, तार नहीं बदले। अगले दिन फिर वही — कुछ और काम निकल आया, कुछ और बहाना मिल गया। आरव को लगता था कि समय तो बहुत है, ज़िंदगी तो लंबी है। लेकिन समय चुपचाप बीत रहा था, और आरव की उम्र के साथ उसके हौसले भी घट रहे थे।
पाँच साल और बीत गए। वीर अब एक प्रसिद्ध संगीतकार बन चुका था। उसकी आवाज़ रेडियो पर बजती थी, टीवी पर उसका चेहरा दिखता था। लोग उसके हाथ छूते थे, उसकी तस्वीरें अख़बारों में छपती थीं। और आरव? आरव अब सत्ताईस साल का था, लेकिन अब भी वहीं खड़ा था जहाँ सत्रह साल की उम्र में था। उसके हाथ में कोई कला नहीं थी, कोई पहचान नहीं थी। उसने कई बार सोचा कि अब शुरू करे, लेकिन फिर डर लगता — *"अब तो देर हो चुकी है, अब क्या फायदा?"* वो अपने आप से नफ़रत करने लगा था। हर रात वो सोचता कि कल से बदलूँगा, और हर सुबह वही पुरानी आदतें, वही पुराने बहाने। समय उसकी ज़िंदगी से निकलता जा रहा था, और आरव बस देखता रहता था।
एक शाम, आरव तालाब के किनारे बैठा रो रहा था। सूरज डूब रहा था, आसमान में नारंगी और गुलाबी रंग फैले हुए थे। तभी एक बूढ़ा चरवाहा अपनी भेड़ों के साथ वहाँ से गुज़रा। उसने आरव को रोते देखा और उसके पास आकर बैठ गया। उसने पूछा, *"बेटा, क्यों रोता है? इतना सुंदर सूरजास्त है, इतनी खूबसूरत शाम है, फिर ये आँसू क्यों?"*
आरव ने अपना चेहरा उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, आवाज़ टूटी हुई। उसने कहा, *"बाबा, मैंने अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर दी। मेरे पास समय था, मेरे पास हुनर था, मेरे पास एक सपना था। लेकिन मैंने उसे समझा नहीं। मैंने हर दिन कल पर टाल दिया। और आज जब मैंने देखा कि मेरा दोस्त वीर जो मेरे साथ शुरू हुआ था, आज वो आसमान पर है और मैं ज़मीन पर हूँ... तो मुझे समझ आया कि मैंने क्या गँवाया है। अब मेरी उम्र बीत चुकी, हौसले टूट चुके। मैं कुछ नहीं कर सकता।"*
बूढ़े ने आसमान की तरफ़ इशारा किया। उड़ते हुए पक्षियों का झुंड जा रहा था, सूरज की आखिरी किरणों में उनके पंख सुनहरे चमक रहे थे। बूढ़े ने कहा, *"देख उन पंछियों को, बेटा। ये पंछी हर साल यहाँ आते हैं। लेकिन क्या वो वही पंछी होते हैं जो पिछले साल आए थे? नहीं। कुछ मर चुके होते हैं, कुछ नए जन्मे होते हैं। समय भी ऐसा ही है — वो हर दिन एक नया पंछी है। जो उड़ गया, वो कभी वापस नहीं आता। तूने जो दस साल बर्बाद किए, वो पंछी उड़ चुके हैं। लेकिन..."* बूढ़े ने रुककर आरव की आँखों में देखा, *"...लेकिन आज का पंछी अभी तेरे सामने है। क्या तू उसे भी उड़ने देगा?"*
आरव की आँखों में आँसू थे, लेकिन साथ में एक चमक भी थी। उसने पूछा, *"तो अब क्या हो सकता है, बाबा? अब तो मेरी उम्र बीत गई, मेरी उँगलियाँ काँपती हैं, मेरी आवाज़ फटती है।"*
बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा, *"बेटा, अभी भी तेरे पास एक पंछी है — आज का दिन। पकड़ ले उसे। क्योंकि जो समय हाथ से निकल जाता है, वो सिर्फ़ दुःख देता है। और जो समय का साथ देता है, वो इतिहास बनाता है। उम्र कभी बाधा नहीं होती, बाधा तो यही सोच होती है कि 'अब देर हो चुकी है'। जब तक साँस है, तब तक शुरुआत है।"*