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साइकिल की उड़ान
एक गरीब साइकिल मैकेनिक और अमीर व्यापारी के बेटे की दोस्ती की कहानी, जो डर, अमीरी-गरीबी की दीवार तोड़कर सफलता की असली रफ़्तार सिखाती है।
कानपुर के एक मोहल्ले में, नाले के किनारे बनी झुग्गियों के बीच, एक छोटी सी दुकान थी — "रामू साइकिल भंडार।" दुकान क्या, बस एक तख्ती और औज़ारों का थैला।
चौदह साल का रामू यहाँ अपने मरहूम पिता की जगह साइकिलें ठीक करता था। स्कूल कब का छूट चुका था, पर उसकी आँखों में एक सपना अब भी ज़िंदा था — साइकिल रेसर बनने का।
हर सुबह चार बजे वह अपनी टूटी-फूटी साइकिल लेकर शहर की सड़कों पर निकल जाता, बिलकुल उन रेसरों की तरह जिन्हें उसने कभी टीवी पर देखा था।
उसी शहर के दूसरे छोर पर, एक बड़ी कोठी में रहता था अद्वैत — शहर के सबसे बड़े कपड़ा व्यापारी का इकलौता बेटा। उसके पास विदेश से मंगाई गई महंगी रेसिंग साइकिल थी, कोच था, सब कुछ था।
सब कुछ, सिवाय हौसले के। अद्वैत को ऊँचाई से डर लगता था, और तेज़ रफ़्तार से भी। हर बार रेस में वह बीच में ही रुक जाता, और पिता की झिड़कियाँ सुनता।
"मैंने इतना पैसा किसलिए लगाया?" पिता चिल्लाते, "एक ट्रॉफी भी नहीं ला सकता?"
एक शाम अद्वैत अपनी महंगी साइकिल लेकर अकेले निकल पड़ा, बिना कोच को बताए। तेज़ मोड़ पर साइकिल की चेन उतर गई और वह सीधा नाले के किनारे जा गिरा — ठीक रामू की दुकान के सामने।
रामू दौड़ा आया। "चोट तो नहीं लगी?" उसने पूछा, फिर साइकिल उठाकर उलट-पुलट कर देखने लगा।