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नूर की आवाज़
एक छोटे शहर के लड़के और एक एआई के बीच अनोखी दोस्ती, जो डर, उम्मीद और इंसानियत की असली ताकत दिखाती है, और दिल बदलती।
रात का समय था। छोटे से शहर धनपुर की गलियों में हल्की-हल्की हवा बह रही थी। सड़क के किनारे लगे पुराने बल्ब पीली रोशनी दे रहे थे। दुकाने बंद हो चुकी थीं। मगर मोहल्ले के आख़िरी छोर पर बने एक छोटे से कमरे में अभी भी एक दीपक जल रहा था।
उस कमरे में आरव बैठा था। उम्र बस सत्रह साल। चेहरे पर थकान, आँखों में सवाल, और दिल में बहुत सारे अधूरे सपने। उसके सामने एक पुराना सा लैपटॉप रखा था। लैपटॉप में एक नया कार्यक्रम खुला था। उसने उसका नाम रखा था—नूर।
नूर कोई आम कार्यक्रम नहीं था।
वह बातें समझ सकता था।
सवालों के जवाब दे सकता था।
और सबसे अजीब बात, वह आरव की आवाज़ के अंदाज़ से उसके मन की हालत भी पहचानने लगा था।
आरव के पिता एक दर्जी थे। कुछ महीनों पहले बीमारी ने उन्हें कमज़ोर कर दिया था। घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया था। माँ लोगों के घरों में काम करती थी। आरव पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन किताबें खरीदना भी अब मुश्किल हो गया था।
उसी दौरान उसके स्कूल के विज्ञान मेले में उसे एक पुराना, टूटा हुआ डिवाइस मिला। टीचर ने कहा था,