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माँ की डायरी एक बेटे की असली दौलत

By Devuu · 13 min read

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माँ की डायरी एक बेटे की असली दौलत

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बेटे ने माँ को बुजुर्ग आश्रम छोड़ा फिर डायरी पढ़कर रो पड़ा एक माँ के बलिदान की सच्ची कहानी जो दिल को छू लेगी

दिसंबर की वो रात आज भी मेरी आँखों के सामने है। कोहरा इतना घना था कि सड़कें अपना रास्ता भूल गई थीं। मैं, अपनी पत्नी मेघना, और मेरी माँ — तीनों एक टैक्सी में बैठे थे। माँ ने अपने झोले से एक पुरानी डायरी निकाली। उसके किनारे पीले पड़ गए थे। उसने उसे मेरी ओर बढ़ाया। "रख ले, बेटा। तेरी बचपन की यादें हैं इसमें।" मैंने झिझकते हुए हाथ बढ़ाया। मेघना की आँखों में वो चुभन थी जो पिछले छह महीनों से मुझे दिख रही थी। हमारी दो कमरों की फ्लैट में माँ के रहने के बाद वो खामोश हो गई थी। रसोई में अलग मसाले, बाथरूम में अलग साबुन, और हमारी ज़िंदगी में एक अजनबी सा अकेलापन। "माँ, ये सब क्यों अभी?" मैंने पूछा। "बस यूँ ही।" उसने मुस्कुराते हुए कहा। वो मुस्कान झूठी थी। मैं जानता था। लेकिन मैंने जानबूझकर अनदेखा किया।

टैक्सी एक बड़े गेट के सामने रुकी। "स्वर्णिम वृद्धाश्रम" — बोर्ड पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था। माँ ने खिड़की से झाँका। अँधेरे में वो इमारत एक जानवर सी लग रही थी जो बूढ़े लोगों को निगल जाती हो। "चलो," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजनबी लगी। माँ ने हाथ आगे बढ़ाया। मैंने उसे सहारा दिया। उसके हाथ काँप रहे थे। सालों से मैंने उन हाथों को ध्यान से नहीं देखा था। अब देख रहा था — सूखी नसें, उभरी हुई नसें, और वो नीली नस जो कलाई पर एक नदी सी बह रही थी। ये वो हाथ थे जिन्होंने मुझे सुलाया, मेरा मुँह पोंछा, मेरी शर्ट इस्त्री की, और मेरे सिर पर हज़ार बार हाथ फेरा। वार्डन एक मोटी महिला थी। उसकी मुस्कान प्लास्टिक की थी। "आइए आइए, श्रीमती गुप्ता जी। आपका कमरा तैयार है।" माँ ने एक बार मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में कुछ था — एक सवाल, या शायद एक उम्मीद। मैंने नज़रें झुका लीं। मेघना ने कहा, "माँ जी, यहाँ अच्छी सुविधाएँ हैं। डॉक्टर रोज़ आते हैं। और हम हर महीने मिलने आएँगे।" माँ ने कुछ नहीं कहा। वो बस अपना झोला कसकर पकड़े खड़ी रही। उस झोले में मेरी बचपन की एक फोटो थी, मेरे पहले जूते थे, और एक डायरी जो अब मेरे हाथ में थी। जब हम वापस टैक्सी में बैठे, मेघना ने राहत की साँस ली। "अब घर शांत होगा।" मैंने कुछ नहीं कहा। सड़क की लाइटें खिड़की से अंदर आ रही थीं और मेरी आँखों में चकाचौंध कर रही थीं। डायरी मेरे हाथ में एक बोझ सी लग रही थी। मैंने उसे डैशबोर्ड पर रख दिया। घर पहुँचकर मैंने उसे अलमारी की सबसे ऊपरी शेल्फ पर धकेल दिया। जैसे धकेल रहा हूँ अपनी यादों को।

तीन साल बीत गए। तीन साल में मैं माँ से सिर्फ चार बार मिला। हर बार वही बहाना — ऑफिस का काम, मेघना की तबीयत, बच्चे का एग्जाम। असली वजह ये थी कि मैं उसकी आँखों में वो सवाल नहीं देखना चाहता था। वो सवाल जो मुझे अपनी नाकामी की याद दिलाता। माँ का फोन आता था हर रविवार। सुबह सात बजे। मेघना कहती, "इतनी सुबह कौन बात करता है।" मैं फोन साइलेंट पर कर देता। फिर दोपहर को जब मन किया, बैक कॉल किया। वो हमेशा उठा लेती। कभी शिकायत नहीं की। "खाना खाया?" "हाँ माँ।" "मेघना ठीक है?" "हाँ।" "नाती कितना बड़ा हो गया होगा।" "हाँ, चार साल का हो गया।" "फोटो भेजना कभी।" "हाँ, भेजूँगा।" — जो मैं कभी नहीं भेजता था। उसकी आवाज़ हर बार कमज़ोर होती जा रही थी। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। या शायद ध्यान देना नहीं चाहता।

फिर वो रात आई। 14 नवंबर 2025। वार्डन का फोन आया। "आपकी माँ को साँस लेने में तकलीफ हो रही है। अस्पताल ले जा रहे हैं।" मैं और मेघना दौड़े। अस्पताल पहुँचे। डॉक्टर ने सिर हिलाया। "बहुत देर हो गई। हार्ट फेल हो गया।" मैं उस कमरे में गया। माँ पीली चादर के नीचे सो रही थी। शांत। जैसे वो हमेशा सोती थी। मैंने उसका हाथ पकड़ा। ठंडा। बर्फ जैसा। और तभी मुझे एहसास हुआ कि ये वो हाथ हैं जिन्होंने मुझे जीवन दिया, और मैंने इन्हें कब का छोड़ दिया था। मैं रोया। पहली बार बिना रोक-टोक रोया। लेकिन आँसू भी कमीने होते हैं। देर से आते हैं।

माँ के सामान में एक छोटा बक्सा था। वार्डन ने दिया। "आपकी माँ रोज़ इसे चूमती थीं।" मैंने बक्सा खोला। अंदर वो पुरानी डायरी थी। वही जो माँ ने उस रात दी थी। मैंने उसे तीन साल बाद हाथ में लिया। अब और भी पीले पन्ने हो गए थे। पहला पन्ना — 15 जून 1989। उस पर लिखा था, "आज मेरे बेटे का जन्म हुआ। रात के दो बजे। डॉक्टर ने कहा कि बच्चा कमज़ोर है। मैंने कसम खाई — इसे इतना मज़बूत बनाऊँगी कि दुनिया की कोई ताकत इसे नहीं तोड़ पाएगी। उसने पहली बार मेरी उँगली पकड़ी। इतनी छोटी उँगली। मैं रो पड़ी। खुशी से।" मेरी आँखें भर आईं। मैंने कभी नहीं सोचा था कि माँ ने मेरे जन्म के बारे में लिखा होगा।

अगला पन्ना — 20 जून 1989। "बेटे को दस्त हो रहे हैं। रात भर रोया। मैंने उसे अपनी छाती से लगाकर रखा। सुबह पति ने कहा, 'तू सो ले, मैं देख लूँगा।' मैंने मना कर दिया। ये मेरा बेटा है। इसकी हर तकलीफ मेरी है।" मैंने पन्ना पलटा। "आज बेटे ने पहला कदम उठाया। गिर गया। फिर उठा। फिर गिरा। रोया नहीं। मैंने उसे गोद में उठाया। कान में कहा — 'मेरा शेर है तू। शेर कभी नहीं रोता।' वो हँस दिया। मेरी दुनिया हँस दी।" पन्ने बदलते गए। माँ की लिखावट बदलती गई। जवानी में तेज़, फिर धीमी, फिर काँपती हुई।

फिर एक पन्ना मिला जिसमें लिखा था, "पहली क्लास में आज बेटे ने मुझसे कहा — 'माँ, तुम मेरे साथ स्कूल तक चलो।' मैं गई। गेट तक। फिर वो अंदर गया। मुड़कर नहीं देखा। मैं खड़ी रही। दोपहर तक। जब तक उसकी छुट्टी नहीं हुई। पति ने कहा, 'पागल हो गई है?' मैंने कहा, 'नहीं, माँ हूँ।'" मैं याद करने की कोशिश की। क्या मैंने मुड़कर देखा था? शायद नहीं। मैं तो बस नए बैग और नई किताबों में खोया हुआ था।

एक और पन्ना पढ़ा। "तीसरी क्लास। बेटे ने कहा — 'माँ, मेरे दोस्त की माँ उसे बर्गर लाती है। तुम भी लाओ।' मैंने पहली बार बर्गर देखा। पति की सैलरी कम थी। लेकिन मैंने बचत की। हफ्ते भर दाल-रोटी खाई। और शनिवार को बेटे को बर्गर दिलाया। वो खुश था। मैं भूखी थी। लेकिन मेरा पेट उसकी मुस्कान से भर गया।" मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वो बर्गर माँ के खून-पसीने से आया था। मुझे लगता था कि माँ को दाल-रोटी पसंद है। इसलिए वो बर्गर नहीं खाती।

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