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हरा रंग चुन लो
✍🏽 एक ज़िंदगी, एक मोड़, एक फ़ैसला
एक थकी हुई सुबह
अर्जुन की उँगलियाँ काँप रही थीं जब उसने इस्तीफ़े की चिट्ठी पर दस्तख़त किए।
सात साल। सात साल उसने उस कंपनी को दिए थे। सुबह नौ से रात ग्यारह तक। त्योहार भी दफ़्तर में। जन्मदिन भी लैपटॉप के सामने।
और बदले में मिला था — एक थका हुआ जिस्म और एक खाली आत्मा।
मुंबई की लोकल ट्रेन में खिड़की के पास बैठे-बैठे उसने बाहर देखा।
इमारतें। धुआँ। भीड़। सब कुछ ग्रे था। बेरंग। जैसे किसी ने दुनिया से रंग चुरा लिए हों।
तभी फ़ोन में माँ का मैसेज आया — "बेटा, दादाजी की तबीयत ठीक नहीं है। एक बार आ जा।"
अर्जुन ने बिना सोचे टिकट बुक किया। गाँव की तरफ़।
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