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गवाह नंबर सात – एक खामोश सच
एक आम आदमी, एक लाश, और एक घड़ी… सच बोलना कब सबसे बड़ा खतरा बन जाता है, जानिए इस क्राइम सस्पेंस कहानी में।
लाश मेरे फ्लैट के बाहर पड़ी थी।
और मैं… मैं उसे मरते हुए देख चुका था।
लेकिन डर की असली वजह ये नहीं थी।
असली वजह ये थी कि उसकी घड़ी मेरे हाथ में थी… और अब वो मेरी कहानी बन चुकी थी।
उस रात की हर आवाज़ आज भी मेरे कानों में गूंजती है। सीढ़ियों की हल्की चरमराहट, किसी के गिरने की धप्प से आवाज़… और फिर अचानक छा जाने वाली खामोशी। वो खामोशी, जो किसी तूफान से कम नहीं होती।
मेरा नाम रोहन मेहता है। मैं दिल्ली के करोल बाग की एक पुरानी बिल्डिंग में रहता हूँ। चौथी मंजिल, बिना लिफ्ट, और इतनी तंग सीढ़ियाँ कि दो लोग साथ में चढ़ नहीं सकते।
उस रात मैं देर से लौटा था। घड़ी में करीब ग्यारह बजे थे। जैसे ही तीसरी मंजिल पर पहुंचा, मैंने उसे देखा। एक आदमी… दीवार से टिका हुआ, जैसे खुद को संभालने की कोशिश कर रहा हो।
पहले लगा नशे में होगा। मैं आगे बढ़ने ही वाला था कि अचानक वो लड़खड़ाया… और सीधा मेरे सामने गिर पड़ा।