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दीये की लौ रहस्यमयी हिंदी कहानी एक वादा, जो पीढ़ियों तक जलता रहा
हवेली में हर पूर्णिमा को जलता एक अनजाना दीपक... पढ़िए रहस्य और सस्पेंस से भरी हिंदी कहानी दीये की लौ
दीये की लौ
## पहला दीपक
हमीरपुर गाँव में बरसात से पहले की वो शाम थी, जब आसमान में बादल इकट्ठे हो रहे होते हैं, पर बारिश कतरा भी नहीं बरसाती। पुराने पीपल के नीचे बैठे गाँव के बूढ़े सुखिया काका ने सिगरेट सुलगाई और अपनी धीमी, सूखी आवाज़ में कहा, "मोहनिया, तेरी माँ ने मुझे बताया था कि तुझे शहर जाकर मास्टरी करनी है। मैं तुझे कुछ दिखाता हूँ।"
मोहनिया — गाँव में सब उसे ऐसे ही पुकारते थे, हालाँकि नाम उसका मोहन था — काका के पीछे-पीछे चल पड़ी। सत्रह साल की वो लड़की थी, जिसकी आँखों में हमेशा कोई सवाल तैरता रहता था। काका उसे गाँव के किनारे स्थित पुराने, टूटे हुए हवेली के सामने ले आए। उस हवेली को गाँव के लोग "महल की रानी" कहते थे, और यह भी कहते थे कि वहाँ आधी रात को कोई तेल का दीपक जलता है।
"ये मालिकाना हवेली सौ साल पुरानी है," काका ने कहा, "और इसकी एक कहानी है, जो हर पीढ़ी गले-गले उतारती है। पर पूरी कहानी किसी को नहीं पता।"
"क्यों, काका?" मोहनिया ने पूछा।
"क्योंकि जो आदमी इसका राज़ जानता था, उसने अपनी कहानी मिट्टी के घड़े में भरकर छुपा दी।"
मोहनिया हँस पड़ी, पर काका के चेहरे पर कोई मज़ाक न था। उस शाम से मोहनिया के दिल में एक बीज बोया गया — और हम जानते हैं कि बीज जल्दी ही पेड़ बन जाते हैं।