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चाय वाले बाबा का राज़ — एक दिल छू लेने वाली कहानी
गरीब चायवाले बाबा और एक स्टूडेंट की कहानी, जिसका अंत आपकी आंखें नम कर देगा। एक भावुक और प्रेरणादायक कहानी।
रेलवे स्टेशन के बाहर, नुक्कड़ पर एक छोटी सी चाय की दुकान थी। दुकान क्या थी, बस एक ठेला था, जिस पर एक पुरानी केतली, कुछ कप, और एक टूटी हुई बेंच रखी थी। हर सुबह पांच बजे, एक बूढ़ा आदमी उस ठेले को लगाता था। लोग उसे "बाबा" कहकर बुलाते थे। किसी को उसका असली नाम नहीं पता था।
बाबा की चाय बहुत खास नहीं थी, बस साधारण अदरक वाली चाय। लेकिन उसमें कुछ ऐसी बात थी कि लोग रोज़ आते थे। शायद चाय की वजह से नहीं, बाबा की मुस्कान की वजह से।
रोहन एक कॉलेज का छात्र था। वह पास के एक सरकारी कॉलेज में पढ़ता था और हर सुबह स्टेशन से होकर कॉलेज जाता था। उसके पिता की मौत तीन साल पहले हो गई थी, और मां घरों में बर्तन धोकर घर चलाती थी। पैसों की तंगी हमेशा रहती थी, लेकिन रोहन पढ़ाई में बहुत होशियार था। उसका सपना था इंजीनियर बनना।
एक सुबह रोहन बाबा की दुकान के पास से गुज़र रहा था। उसके पास सिर्फ दस रुपये थे, और वह सोच रहा था कि चाय पिए या किताब के लिए फोटोकॉपी करवाए। उसने चाय नहीं पी और आगे बढ़ने लगा।
"बेटा, रुको," बाबा ने आवाज़ दी।
रोहन रुक गया। "जी बाबा?"
"चाय पीकर जाओ। आज मेरी तरफ से।"
"नहीं बाबा, पैसे नहीं हैं मेरे पास," रोहन ने शर्मिंदगी से कहा।