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अधूरी मूर्ति
एक मूर्तिकार गुरु और उसके शिष्य की कहानी, जहाँ असली शिक्षा रहस्य में नहीं, धैर्य और अधूरेपन को स्वीकारने में छुपी है।
पत्थर तराशने की आवाज़ें उस गाँव की पहचान थीं। हर सुबह छेनी-हथौड़े की टन-टन से गली जागती थी। इसी गली के आख़िरी छोर पर विश्वनाथ गुरु की कार्यशाला थी।
विश्वनाथ गुरु की मूर्तियाँ दूर-दूर तक मशहूर थीं। लोग कहते थे उनके हाथ जिस पत्थर को छू लें, उसमें साँस आ जाती है।
अर्जुन उनका सबसे नया शिष्य था। बीस साल का, आँखों में जल्दी सीखने की भूख लिए।
पहले ही दिन अर्जुन ने पूछा था, "गुरुजी, वो कौन सा रहस्य है जिससे आपकी मूर्तियाँ जीवंत लगती हैं?"
गुरु मुस्कुराए, कुछ नहीं बोले। बस एक पत्थर की सिल्ली उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
तीन साल बीत गए। अर्जुन ने बर्तन बनाना सीखा, आधार गढ़ना सीखा, हाथ-पैर की बनावट सीखी। पर हर बार जब वह किसी मूर्ति के चेहरे तक पहुँचता, गुरु उसे रोक देते।
"अभी नहीं," वे कहते, "चेहरा आख़िरी चीज़ है। और सबसे मुश्किल भी।"
अर्जुन के भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसके साथ के दूसरे शिष्य, जो बाद में आए थे, अब पूरी मूर्तियाँ बना रहे थे। वह अब भी सिर्फ़ हाथ-पैर तराश रहा था।