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4000 रुपये में फ्लैट

Chapter 1 · Tanshu

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4000 रुपये में फ्लैट

hi

मुंबई... सपनों का शहर। कहने को तो यहाँ हर किसी के लिए जगह है, लेकिन हकीकत यह है कि यहाँ सिर छुपाने की एक छोटी सी छत के लिए भी इंसान की जेब खाली हो जाती है। इस शहर में जहाँ एक वक्त का ढंग का खाना भी जेब पर भारी पड़ता है, वहाँ अगर कोई आपसे कहे कि आपको बांद्रा जैसी पॉश लोकेशन पर चार हजार रुपये में रहने की जगह मिल रही है, तो आप क्या कहेंगे?

जाहिर है, आप उसे पागल समझेंगे या फिर किसी बड़े फ्रॉड का शिकार होने से बचने के लिए तुरंत पीछे हट जाएंगे। मेरे साथ भी यही हुआ। दोपहर के दो बज रहे थे, लोकल ट्रेन के धक्के खाकर और नौकरी के इंटरव्यूज़ से रिजेक्ट होकर मैं गोरेगांव के एक छोटे से पार्क के बेंच पर बैठा हुआ अपनी किस्मत को कोस रहा था। जेब में कुछ आखिरी नोट बचे थे और मकान मालिक ने साफ कह दिया था कि अगर इस महीने का किराया समय पर नहीं मिला, तो सामान समेत बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा।

तभी निराशा में डूबे हुए मैंने मोबाइल निकाला और OLX ऐप पर सस्ते कमरों की तलाश करने लगा। स्क्रॉल करते-करते अचानक मेरी नज़र एक विज्ञापन (Ad) पर थमी। हेडलाइन लिखी थी— "1BHK for Rent in Bandra, 4000 only"।

मैंने अपनी आँखें मलीं। मुझे लगा शायद धूप की वजह से मुझे गलत दिख रहा है। बांद्रा में चार हजार? नामुमकिन! जहाँ लोग एक छोटे से कमरे का बीस-तीस हजार किराया वसूलते हैं, वहाँ कोई चार हजार में पूरा 1BHK क्यों देगा? जरूर कोई मज़ाक था, या फिर कोई नया ऑनलाइन स्कैम। लेकिन कहते हैं ना कि मरता क्या न करता। जेब के खालीपन ने मुझे मजबूर किया और मैंने बिना ज्यादा सोचे स्क्रीन पर दिख रहे नंबर पर कॉल मिला दिया।

फोन की घंटियाँ बजीं और तीसरी बेल पर दूसरी तरफ से एक भारी और कांपती हुई आवाज़ आई। वह किसी बूढ़ी औरत की आवाज़ थी। "हेलो?" मैंने हिचकिचाते हुए पूछा, "अंटी, वो OLX पर फ्लैट का ऐड देखा था..."

"हाँ, फ्लैट खाली है," मेरी बात पूरी होने से पहले ही बुढ़िया ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सा सूखापन था। "अगर देखना है, तो अभी के अभी आ जाओ।" उसने बिना मुझसे कोई और सवाल पूछे सीधा पता (Address) बताया और फोन काट दिया। मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए मैं तुरंत बांद्रा के लिए निकल गया।

बांद्रा स्टेशन से बाहर निकलकर बुढ़िया के बताए पते पर पहुँचने में मुझे मुश्किल से दस मिनट लगे। जैसे-जैसे मैं मुख्य सड़क से अंदर की गलियों में जा रहा था, गाड़ियों का शोर कम होता गया। वह गली अजीब तरह से सुनसान थी। दोपहर के वक्त भी वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था, जैसे लोग घरों से बाहर निकलने से कतराते हों।

आखिरकार, मैं उस बिल्डिंग के सामने खड़ा था। बिल्डिंग काफी पुरानी थी, शायद सत्तर के दशक की। दीवारों का प्लास्टर कहीं-कहीं से उखड़ चुका था, लेकिन आसपास के माहौल के हिसाब से वह काफी साफ-सुथरी लग रही थी। बिल्डिंग के मुख्य दरवाज़े पर ही वह बुढ़िया खड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी। उम्र रही होगी कोई 70 या 75 साल। चेहरे पर झुर्रियों का जाल था, सफेद बाल करीने से बंधे थे, लेकिन उनकी आँखें... उनकी आँखें इतनी तेज़ और गहरी थीं कि एक पल को मुझे लगा जैसे वो सीधे मेरी आत्मा के पार देख रही हों।

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